
आवाज़
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पुकारती
सर्द आवाज़ ,
चीरती हे कुहासे को ..
साये निगलने वाली
धुंध .
चारों और ढाप लेती हे ....
आवाज़ का एक पहलु
भारी वेगवती हवा सा ...,
दूसरा बहुत सूक्ष्म ,
उदास पवन की तरह ,
पवन से अपने अस्तित्व का
सबूत चुराता हुआ ...
शांय – शांय सी गूंज
होती अरण्य में ,
पिघलते शीशे की तरह
उतरती कानो में ......
बार बार झरती होंटो से
पीले पत्तों की तरह
उग आते बोल ,
फिर हरे पत्तों से ..
अपनी ही आवाजों
के पीछे भागती
मृग मरीचिका सी
तुम्हें पुकारती हुई
खो देती हू
चाह के भँवर में
अपनी ही आवाज़ .....!!!
प्रवेश सोनी
haan !! apni hi awaaj ke bhanwar me kabhi kabhi khud kho jate hain..!
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