
फासलो के
फलसफे
अहम और स्वभिमान
का द्वंद
अनुपूरक होते रिश्ते
दरकती दीवारे
बनती
सपनों की कब्रगाह
स्याह अंधेरो में
चीखते उजाले
कब ,केसे होगी भोर
असमंजस
कब होगी उदय
मन क्षितिज पर
सुखो की लालिमा
कब क्षीण होगी
दुखो की तपन
एक बूंद
आशा का प्रकाश
सहला देती हे
शीतल चांदनी बन
उठता हे मन फिर
एक बार
मर कर जीने के लिए .....!!!
प्रवेश सोनी
शीतल चांदनी बन उठता है मन फिर, एक बार मर कर जीने के लिये।
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर दर्द भरी कविता जो मन को कहीं न कहीं से उद्वेलित करती है।
शुक्रिया डॉ. संजय जी
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