
भावावेश मयी खगी
कागज के पंख
लगा कर
उड़ने की कोशिश में
फडफडा रही हे
कभी दुःख की व्यथा भरी
कभी सुख की कथा भरी
चुगती हे दाने
उल्लास -विषाद के
कभी आर्तक्रदन
कभी निस्तब्ध निश्चेतन
विकल ह्रदय नभ पर
करती कभी उन्मन्न गुंजन
लहूलुहान हो जाती हे जब
अंतर्मन के दर्पण पर
प्रहार कर स्वं को समझ नहीं पाती
हे कोन जो अंतस में हे द्वंदरत ?
विलग रहता चेतन से सदा
थक हार निढाल हो
निर्मिमेष नजरो से
निहार सब और
उड़ जाती हे फिर
अन्नत में तलाशने खुद को ..........
pravesh soni
उड़ जाती है फिर ,
ReplyDeleteअनंत में तलाशने ख़ुद को।
बहुत सुन्दर दर्द से लबरेज़ कविता , बधाई।