
कलम स्याही रूठे से हे
पन्ने कुछ उखड़े से हे
भाव शून्य मन में
कविता के पर टूटे से हे
मन की टूटन में अब
पर्वत सी पीर हुई हे
आँखों में आंसू
अब रीते से हे
मन के रिश्तों को
न कोई समझे
सब व्योपारी
अब तन के हे
सपनों के दिन
अब ना उगते
सूरज के सोदागर
अब जग में हे ...
प्रवेश सोनी
awesome...... super super super like.... :)
ReplyDeletethanks shweta
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