
ओरत
अतीत के पन्नों में झाँका
तो एक नादान ,अनजान
चंचल ,चपल ,बहकी मृगया सी
कुलाचे भारती हुई
नदी किनारे सीपीया बिनती हुई
भविष्य से बेखबर ,
वर्तमान में निश्चिन्त
अपने में ही जीती सी
अबोध सी कली-
कोन कही में शायद !!
वर्तमान की चोखट पर खडी
एक बेबस छाया ,
घर में बस एक कोना आया ,
दमित विचारों की मकड़ी
झुकी गर्दन ,कभी थी अकड़ी
सामाजिक बंधनों में शिथिल
उन्मुक्त गगन को निहारती
,स्वछंद विचरण की टूटी हुई आशा
भूत के न लोटते पल
वर्तमान के शोषित क्षण
भविष्य की चिंताओ में
स्वम को भूली सी
ओरो के लिए जीती
एक बेबस ओरत
कोन शायद में
हांहाँ में ही तो !!!!!
प्रवेश सोनी
औरत की नियति को निजी अनुभवों से जोडकर कविता में कहने का प्रयास प्रशंसनीय है। शब्दों का चयन बेहतर है, बुनावट भी समय के साथ और निखरेगी, ऐसा विश्वास है। हार्दिक शुभकामनाएं
ReplyDeleteशुक्रिया माया जी ,आपकी शुभकामनाये ऊर्जा प्रदान करती है ,मेरी कोशिश अच्छा लिखने के प्रयास में रहेगी ..
ReplyDeletejagdish ji bahut bahut abhar apani vecharik abhivykti ke liye
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