Monday, October 7, 2013




यही था उसका दोष
वो नारी थी
अहिल्या ....

छली गई ...नर से ,
शापित हुई ..नर से ,
उद्धार हुआ ...नर से ....

अंततः नारी
मादा
होकर मर जाती है

नर
बहुरूप में
आदि से अनादि तक
जीवित हैं....!!!

प्रवेश सोनी

Saturday, October 5, 2013

कारा
========

दाना है ,
पानी है ,
सलाखे ....!
पिंजरा .......!!
कारा ..........?

नहीं नहीं नीड़ ,
नहीं नहीं कारा ....

नहीं नीड़ ,
नहीं कारा....

नीड़ ,
कारा...

नीड़ ,
हां नीड़
फडफडाहट में पर ही जख्मी हुए ...
अन्तंत उसने समझौतो की थपकियों
से मन को सुला दिया .......!!!

प्रवेश सोनी

Tuesday, August 20, 2013

चुप रहना आदत नहीं थी ...
बचाए थे शब्द ,
लौटा दूंगी प्रेम का ब्याज जोड़ कर
तुम्हारे उलाहने पर
कभी तो कहोगे
“बहुत चुप –चुप रहती हो तुम “
ठीक उसी तरह
जब पहले मेरी आवाज सुनने की बचैनी में कहते थे तुम .....
सुन कर बरस जाते थे प्रीत के फूल मेरी बातों में ......
और तुम्हारे उलाहने सुनने को
अक्क्सर चुप हो जाया करती थी ...!!

पर अब तुम्हारे उलाहने ही चुप कर देते है

ब्याज जुड़ नहीं पाया ,
कोरी बचत कब तक चलती ...
बचे शब्द चुक गए चुप रहने में ..
अच्छा है
चुप्पी अब आदत बन गई
आदतो से निभाह हो जाती है

तुम्हारे उलाहने की धूप में
कभी छट जाये शायद
यह चुप रहने की आदत का कुहासा ....!!!

pravesh soni

बहुत बोलती है औरते
=============
बहुत बोलती है औरते ,
जहाँ कही भी मिल बैठी,
बोलती है बोलना शुरू हो तो थमता नहीं क्रम ..
फिर भी कह नहीं पाती अपनी बात
शायद सीखा नहीं कहना ,
बावजूद इसके कि बहुत बोलती है ....

जाने कितनी सदियों से देह का दर्द देह मै समेटे ,
मज़े में होना दर्शाती है औरते
सीखा यही तो था ...

कोई कलम संवेदनाओ की
उस परत तक नहीं पहुच पाई
जिसमे छिपा सच यह भोगती तो है
लेकिन कहन में असमर्थ है,
यह भोगा हुआ सच निशब्द है ....
कैसे कहती फिर यह .....,

हां बोलती है उस झूठ को
जिसे सच बनाने की जद्द में
खुद से बेदखल होती जाती है ..

हां बहुत बोलती है औरते ,
बस कह नहीं पाती
माथे की उन सलवटो को जो कब उम्र को बुढा देती है
जिंदगी के पन्नो को पलटते -पलटते
नसों में आये तनाव के कारण ,...

हां बहुत बोलती है औरते
बस उन सपनों को नहीं कह पाती
जो आँखों में आकर छल जाते है उसकी नींद ...
और बेपहर उठ कर बुहारने लग जाती है आँगन ,
कि कब कोई सपना आ बैठे उससे बतियाने .
और जब नहीं बोलती है
तब खामोश हो जाती है औरते ,...
खामोश होना भी तो औरत होना ही है
तब उनसे भी ज्यादा बोलती है
उनकी खामोशी .....!!!


pravesh soni

Thursday, February 28, 2013


प्रेम ......
माने ढाई आखर ...
कितनी स्याही बीती इन्हे लिखने में ...
कितनी ही कलम लालायित है आज भी इन्हें लिखने को ..
वर्णों ,छंदों ,पंथो ,ग्रंथो में ,
गाई इसकी अनुपम गाथा ..
अनेक प्रतिबिम्बों में उलझा हुआ ,एक शाश्वत सत्य
प्रेम ...
मौसम ने बदल – बदल कर रिझाया इसे ,
मानो मौसम की ही उपज हो प्रेम ...
प्रकृति साज़ छेड़ती है ,और गा उठती इसके गीत ..
चाँद ,खुशबु ,पुष्प ,भ्रमर, हवा,खग ,लहर की जुबां से
मानो धर लिया हो इन्होने ही आका र प्रेम का ..
विधाता ने रचा प्रेम ..कहा
मुझे पाने की राह हे
प्रेम ...
विधाता को पाना ,और प्रेम को पाना सम ही तो हे ..
ऐसा रंग की दूजा न कोई रंग चढ़े ...
जो भीगा उसने पाया .
और पाने की चाह में खुद को खोया ..

कहा किसी ने ..
आँखों का महाकाव्य हे ,
लेकिन बंद आँखों की जोत है
प्रेम ....
प्रेम पंडितो ने गुरुओ ने बाँट दिया ,
भिन्न- भिन्न वृतो में इसको ..
लेकिन हर वृत प्रेम परिधि में ही घुमाता मिला
ह्रदय की कोमलतम कल्पना का आयाम है
प्रेम ...
दो नैनो से दरस न होए इसका ,...
मन की आँखों से दिखे
प्रेम ....
आह ...कितना जटिल तुझे समझना ,पाना
प्रेम ..
भीगा इक अहसास छू गया मन को .
उसकी आँखों का सहरा ,
तप गया मेरी आँखों में जब से ..
उसके होंटो का मधुबन महक गया
होंटो पे मेरे जब से ...
बस में जान गई .....
प्रेम तुम मुझमे हो ...
हां हां में प्रेममय हो गई तब से ...!!!


pravesh soni

Thursday, January 10, 2013


भवरों ने कलियों से 
फूलो ने तितली से 
शमां से पूछा पतंगे ने 
आकाश ने धरा से ,
नदिया ने सागर से ,

क्या कहा ...
जो सच में लगे सपना ...
और सपने मै सच लगे 
अह्सास गहरा ,
जिसमे ढूबे तो अच्छा लगे ...

देख सुन सब 
मन को ....
नाम तेरा भला लगे ..!!!

प्रवेश सोनी
 

लफ्जों – लफ्जों का दिल है छलनी ,
केसे ग़ज़ल का श्रृगांर करे ..

सन्नाटा भी है घायल ,
आवाजों के जंगल में 
केसे दिल की बात सुने ..

खुद को खो बैठे है ,
रिश्तो के मेलो में 
केसे ढूंढे ,किससे फ़रियाद करे ..


बंजारा मन बंधन न माने 
केसे इसको समझे ,
केसे इसकी मनुहार करे ....!!

प्रवेश सोनी

Thursday, October 18, 2012


रिश्ते
====

रिश्ते ....
कितने सस्ते ...
निभ जाने कि खातिर ,
करने होते
कितने
महंगे समझौते .....

समझौते गर बन जाते रिश्ते .....
जीवन बीते फिर
कितने सस्ते ......!!


प्रवेश सोनी
 — 

देह यात्रा .....
अविराम ,
अवचेतन मन से हारी ....,
सम्पूर्णता कि राह मै ,
शून्यता

नेसर्गिक देह दीप मै ,..
नेह कि बाती जला ,
टपकता उजास ...
मन के स्याह से जीतने के लिए ..

अनवरत ,अविराम यात्रा ..!!

Saturday, August 4, 2012

 चाहू होना शून्य 
=========

स्मृतियों के पल ,
हवा पर सवार होकर ,
अपने पूरे वजूद से ..

खडका देते है मन की किवडिया..
समेट लाते है अनंत ब्रम्हाण्ड प्रेम का ..
अंतस में सजा देते है
ख्वाबों के शामियाने ,
तरंगित साँसो मै गूंजती है
स्वर्णिम शहनाई ..

एक छुअन ,
एक सिहरन ..,
अधरों पर थरथराती एक कहानी ,
मीरा की ह्रदय जोत ,
राधा की अटूट प्रीत ..
चातकी की आस ..
जन्म- जन्मो की साध ,
मनमीत मेरे ,
प्रीत मै तेरे ,
रचे सब गीत मेरे ..
दिव्य अलोकिक यादों की घड़ियाँ ,
अनंत कर देती
मुझको मुझमे ..
चाहू होना शून्य ,
विलीन होकर बस उनमे ...!!!



प्रवेश सोनी

Monday, July 30, 2012


अजनबी .....
यह गीत जो गुनगुना रही हूँ मै ,
उसकी लय और ताल ,
तेरी ही तो पलकों की थिरकन से आई हैं ...
मेरी और जो उठकर ,
सिखा गई आरोह – अवरोह ....

कितने रंगीन वसन ओढ़ बैठी है
यह जिंदगी ...
और इठला रही है ..
ये रंग तेरी ही तो हँसी ने भरे हैं...
बड़े पक्के रंग हैं यह ,
और भी चटक जाते है दुःख की धूप मै ..

ये संदली सपने ,
तुझसे ही तो आँखों मै आ बसे हैं मेरे
खड़े हो तुम उम्मीद की जमीं पर
चाँद तारे लिए हुए ...

अजनबी..
केसे कहू तुम्हे
बिन तेरे तो साँसे मेरी ,
अजनबी लगने लगी है अब मुझे .....!!

प्रवेश सोनी
========

Sunday, July 22, 2012


आशा के उन्मुक्त शिखर पर
नेह मेघ बन छाओ ....
अनुबंधित कर दो
विचलित मन को
अनुराग मेह बरसाओ...
व्यथित तपित तन को
नयन बयार से सहलाओ ...
गुन -गुन गुंजित होंटो से
शब्द मधुरस टपकाओ ...
द्वार खड़ी हे
वादों के पतझड़ में
मिलन की आस तुम्हारी
विश्वास का मदुमास लिए
प्रियतम अब तो आजाओ ..
मन बैरागी न हो जाये ,
तन यौवन  न ढल जाये
अरमा चिता पर ,
सोये पहले
मधुमीत तुम आजाओ
सहरा से तपते तन पर
नेह मेघ बन छा जाओ ....!!
 

Saturday, June 23, 2012

स्मृतियों के बीहड़ मै ..

सपनों के पीछे दोड़ते हुए ... 

चू- चूहा जाते है कदम
लहू से ...


मन की सतह पर
उभर आता है ,

एक और जख्म ..

बहने को नहीं होती कोई नीली नसे 

भीतर ही भीतर सड़ता रहता है
जहरीला मवाद ....

मरता नहीं फिर भी स्वप्न ..


हाँ.. तेरती रहती है परछाइया
आँखों की सतह पर ,

थकन ओढ़ कर
सो जाता है सपना
सोच कर ... 

कोई सुबह आकर
जगायेगी जरुर .....!


प्रवेश सोनी

Friday, June 8, 2012

सुरमयी सांझ ने समेटा
रौशनी का कारोबार
अपने आँचल मै .....

रात ने बिछा दी है चादर
आसमाँ पर सितारों की ..

हाँ ...आँखों को इन्तजार है
जीवन के सपने का ,....

तुमने ही तो कहा था
सपनों मै ही तो जिया जाता है
सच्चा जीवन ..
और मै सपने को जीने के लिए
हर सांझ को रात में समेटती रही ...!!

प्रवेश सोनी

Tuesday, May 22, 2012



साँसों की महक से .
बहका तन ,,,
और सुध खो बैठी रात की रानी ,

छिटक कर डाल से ,
चहका हरसिंगार ...

पूरे चाँद का नशा था रात पर ,

जाग कर थिरकती रही ,
सात स्वरों के साथ ...

लुक छिप कर चोरी चोरी

सितारों मै भी हो रही ठिठोली ...

सारी कायनात नहाई हो

जैसे खुशबु में तेरी ....

हाँ ,तभी तो मेरे गूंगे अहसासों को

शब्द मिले ...

गिरवी जो रख दिए थे मैंने ...

तुम्हारे पास ,
नजरो की सौदेबाजी मै ....!!!



प्रवेश सोनी

Wednesday, May 16, 2012



कितने आवारा है यह तेरी सोच के बादल ..

वक्त -बेवक्त छा जाते हैं मन पर ,....

घुसपैठिए की तरह ,
विचारों में लगाते हैं  सेंध ....

सोचती हूँ ,
किसी संदूक में बंद कर
ताला जड दूँ  ....
पर कैसे  ...!!


मन में चुभते तीर से   ....
जाने क्यों नीर बन
आँखों से बह जाते हैं ,
यह आवारा बादल ...!!!


प्रवेश  सोनी

Saturday, May 5, 2012

आँसुओ की इबारत
रंग बदल लेती है ,
अनुभूतियो के ताप मै

कोरे निश्चल प्रेम में
निर्मल मन कर जाते आँसू..
प्रिय के आघात
सहर्ष सह जाते ..
गंगा –जम सम पावन हो जाती आँखे

उम्मीद का सूरज ,
जगमगाता अपने आसमां पे
तब उत्सव भी मना लेते आँसू ...

सूखे पत्ते वाली
उदास ऋूतुए,
बंजर कर देती आँखों को ..
सफ़ेद सूखी जमीं पर
सपनो की फसल कहा उग पाती ,
घुटते अंदर ही अंदर ,
लावा बन जाते आँसू

बनी रहे ,
इसलिए सिमटना चाहती
समझ के आँचल में ,
यह बदलती इबारत ....!

नहीं चाहती
अहम और जिद्द के
उथले समंदर में समाना ...!!!



प्रवेश सोनी 
आँसुओ की इबारत
रंग बदल लेती है ,
अनुभूतियो के ताप मै

कोरे निश्चल प्रेम में
निर्मल मन कर जाते आँसू..
प्रिय के आघात
सहर्ष सह जाते ..
गंगा –जम सम पावन हो जाती आँखे

उम्मीद का सूरज ,
जगमगाता अपने आसमां पे
तब उत्सव भी मना लेते आँसू ...

सूखे पत्ते वाली
उदास ऋूतुए,
बंजर कर देती आँखों को ..
सफ़ेद सूखी जमीं पर
सपनो की फसल कहा उग पाती ,
घुटते अंदर ही अंदर ,
लावा बन जाते आँसू

बनी रहे ,
इसलिए सिमटना चाहती
समझ के आँचल में ,
यह बदलती इबारत ....!

नहीं चाहती
अहम और जिद्द के
उथले समंदर में समाना ...!!!






Saturday, April 28, 2012


शख्स
========

जिस्म की दीवार मै
कैद शख्स ,
पत्थर सा.....
जन्मता है पीड़ा के गर्भ से
कहता नहीं ,
सुनता है ,वो जो अनसुना है
हैरान ,....खोया खोया सा
सोचता है ,
कोई तो तलाशता होगा उसे ...
किसी मन का
अटका हुआ
ख्याल बन .....
पथरीले मौन में
क्यों हो जाता है
असहनीय शोर ....!
दो बूंद आँख का पानी ,
जड़ता को नमी देकर
उष्मित कर देता है
अहसासों को ....
नीरव से महालय मै
हलाहल पिए कंठ पर हो
जाता अभिषेक
दुग्ध ,और गंगाजल से
शीतल शीतल ...!!!

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Tuesday, March 27, 2012


पंखो में भर परवाज..
उड़ गए पाँखी ,
नापने आकाश ....
नीरव नीड़ ,
टुकुर रहा उनके पदचाप ,
सूनापन फेला सब और ,
पसरा पसरा है मौन ....
वजूद जेसे उसका भी
ले गए अपने साथ ....

जाने केसी आस लिए ,
बाँध बैठा शाखो से बंधन ..
अतीत के झरोखो में ,
बस अब यादों का अवलम्बन...

मन विभोर हुआ ,मन मगन हुआ ,
नन्ही पलकों ने जब खोला था ,
नयनो का चिलमन ...

कानो में अमृत घुल आया था
तुतलाती जिव्हा से चहका था
टूटे फूटे शब्दों का चहकन ....

आँगन में भी दर्प समाया ,
गुंजी थी जब ,
नन्हे कदमो की फुदकन ..

क्षण क्षण खुद से जूझ रहा
खुद ही खुद से पूछ रहा
सांझ ढले सब आते घर ,
लोटेंगे क्या मेरे वो पल ..
सोच यही ,सांझ को टेर रहा
“नीड़ “ निविड़ तम को ठेल रहा .......!!!


प्रवेश सोनी